है क्या कसुर इसमें, अगर मै अनोखी हूं,
मै भी तो तुम्हारी तरह,इंसान ही हूं,
सांसे मेरी भी चलती है,
धड़कन मेरी भी धड़कती है,
फिर क्युं मुझे खुद से दूर किए हो?
फिर क्यूं मुझे खुद से अलग किए हो?
है मेरी भी पहचान इस जहां में
है मेरा भी कुछ ईमान मेरे जहां में
फिर क्यूं मेरे वजूद पर सवाल करते हो?
फिर क्युं मुझे मेरे ही घर से बेघर करते हो?
हां,वक्त आ गया है,उस संग्राम का,
जो हम लाएंगे, हां वक्त आ गया है,
तुम्हारे सोच को बदलने का, जो हम बदलेंगे,
हां वक्त आ गया है,अपने हक के लड़ाई का,
जो हम लड़ेंगे।